चीन की एक ‘ना’ से भारत होगा मालामाल! ऐसा क्या हुआ कि टैरिफ घटाने को तैयार हो गए ट्रंप?

 चीन की एक ‘ना’ से भारत होगा मालामाल! ऐसा क्या हुआ कि टैरिफ घटाने को तैयार हो गए ट्रंप?

भारत और अमेरिका एक बड़े व्यापार समझौते के अंतिम चरण में हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इस डील से भारतीय सामानों पर लगा 50% का भारी टैरिफ घटकर 15-16% रह सकता है. CEA नागेश्वरन ने भी जल्द 'दंडात्मक शुल्क' हटने की उम्मीद जताई है.

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर एक बहुत बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आ रही है. दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर बातचीत अंतिम चरण में पहुंच गई है. इकोनॉमिक्स टाइम्स की एक खबर के मुताबिक, अगर यह समझौता हो जाता है, तो भारतीय सामानों के निर्यात पर लगने वाला भारी-भरकम 50% का टैरिफ घटकर 15% से 16% के बीच आ सकता है. यह भारत के निर्यातकों और अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी राहत होगी.

क्या खत्म होंगे व्हाइट हाउस के दंडात्मक शुल्क?

कोलकाता में भारत चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, CEA नागेश्वरन ने इस मुद्दे पर काफी भरोसा जताया. उन्होंने कहा, “हालांकि मेरे पास कोई जादुई छड़ी या अंदर की जानकारी नहीं है, लेकिन मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि अगले कुछ महीनों में, या शायद उससे भी पहले, हम कम से कम 25% के अतिरिक्त दंडात्मक टैरिफ का समाधान देख लेंगे.” यह 25% का शुल्क व्हाइट हाउस द्वारा लगाया गया था, जिसने भारतीय निर्यातकों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं.

नागेश्वरन ने इससे भी आगे की उम्मीद जताई. उन्होंने संकेत दिया कि 25% के पारस्परिक (reciprocal) टैरिफ को कम करने पर भी बातचीत चल रही है. उन्होंने कहा, “ऐसा भी हो सकता है कि 25% का यह पारस्परिक टैरिफ भी उस स्तर तक कम हो जाए, जिसकी हम पहले उम्मीद कर रहे थे, यानी 15 से 16% के बीच.” उन्होंने साफ कहा कि अगर ऐसा होता है, तो यह जश्न मनाने का एक और भी बड़ा अवसर होगा.

डील के बदले रूस से तेल खरीद घटाएगा भारत?

यह समझौता कुछ शर्तों के साथ आ सकता है. मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा और कृषि, ये दो प्रमुख मुद्दे रहे हैं जिन पर बातचीत अटकी हुई थी. बताया जा रहा है कि भारत रूसी तेल के आयात में धीरे-धीरे कमी करने पर सहमत हो सकता है. यह एक बड़ा कदम होगा, क्योंकि रूसी तेल की खरीद ही वह वजह थी जिसके चलते भारतीय निर्यातों पर 25% का अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाया गया था. यह शुल्क अप्रैल में घोषित 25% के पारस्परिक टैरिफ के ऊपर था. आंकड़े बताते हैं कि भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 34% हिस्सा रूस से आयात करता है, जबकि अमेरिका से उसकी तेल और गैस की जरूरतों का लगभग 10% हिस्सा आता है. इसके अलावा, कृषि क्षेत्र में भी भारत कुछ रियायतें दे सकता है.

चीन ने दिया झटका, तो भारत के पास आया अमेरिका

अमेरिका के इस कदम के पीछे एक बड़ी वजह चीन है. दरअसल, अमेरिका अपने कृषि उत्पादों के लिए नए खरीदार तलाश रहा है, क्योंकि चीन ने अमेरिकी मकई का आयात काफी कम कर दिया है. साल 2022 में जहां चीन ने अमेरिका से 5.2 बिलियन डॉलर की मकई खरीदी थी, वहीं 2024 में यह आंकड़ा गिरकर महज 331 मिलियन डॉलर रह गया. इससे अमेरिका के कुल मकई निर्यात (जो 2022 में 18.57 बिलियन डॉलर था) 2024 में घटकर 13.7 बिलियन डॉलर रह गया.

ऐसे में भारत अमेरिका के लिए एक बड़ा बाजार बन सकता है. भारत अमेरिका से गैर-जीएम मकई का आयात बढ़ा सकता है, हालांकि इन पर आयात शुल्क 15% पर अपरिवर्तित रहेगा. वर्तमान में, अमेरिकी मकई आयात का कोटा सालाना 0.5 मिलियन टन है. ऐसी अटकलें हैं कि इस महीने के अंत में होने वाले आसियान शिखर सम्मेलन (ASEAN Summit) में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच इस व्यापार सौदे की घोषणा हो सकती है. हालांकि, अभी तक दोनों नेताओं ने शिखर सम्मेलन में अपनी उपस्थिति की पुष्टि नहीं की है.

क्या सस्ता तेल देगा अमेरिका?

रिपोर्ट के मुताबिक, इस सौदे की रूपरेखा भी लगभग तय है. भारत इथेनॉल आयात की अनुमति देने और रूसी तेल की खरीद कम करने पर विचार कर रहा है. इसके बदले में, अमेरिका से ऊर्जा व्यापार में रियायतें मिलने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि सरकारी तेल कंपनियों को अमेरिका की ओर से कच्चे तेल की सोर्सिंग में विविधता लाने की सलाह दी जाएगी.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय अधिकारियों ने मॉस्को का दौरा किया और यह संदेश दिया कि भारत रूस से कच्चे तेल का आयात कम करेगा. हालांकि, एक पेंच यह है कि अमेरिका अभी तक रूस की रियायती कीमत पर तेल उपलब्ध कराने के लिए सहमत नहीं हुआ है. लेकिन, हाल ही में रूसी छूट और बेंचमार्क कच्चे तेल के बीच का अंतर काफी कम हो गया है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में 23 डॉलर प्रति बैरल का यह अंतर अब घटकर केवल 2 से 2.50 डॉलर प्रति बैरल रह गया है, जिससे मध्य पूर्वी और अमेरिकी कच्चा तेल अधिक प्रतिस्पर्धी हो गया है.

वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका को भारत का निर्यात 86.51 बिलियन डॉलर रहा, जो इसे नई दिल्ली के लिए माल ढुलाई का सबसे बड़ा बाजार बनाता है. CEA नागेश्वरन के मुताबिक, इस साल टैरिफ का असर बहुत ज्यादा नहीं पड़ा है, क्योंकि भारत ने इस साल पहले ही 50% वॉल्यूम हासिल कर लिया है. लेकिन, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह टैरिफ बना रहता, तो अगले साल अमेरिका को होने वाले निर्यात की मात्रा में 30% की कमी आ सकती थी. यह एक बड़ा झटका होता, क्योंकि देश का कुल निर्यात सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का एक-चौथाई हिस्सा है. यह डील उस बड़े झटके से भारत को बचा सकती है.

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